09 अगस्त 2009

क्या करें साला सिलेंडर महंगा हो गया

अब तो ऐसा लगने लगा है कि हमारे देश में आने वाली पीढियों को सायकल और बैलगाडियों का मुंह देखना पड़ेगा क्योंकि इतने तेजी से हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में लगे हुए हैं कि आने वाले कुछ सालों में पेट्रोल, सिलेंडर, डीज़ल, का रेट इतना बढ़ जायेगा कि आम आदमी उसके उपयोग से डरने लगेगा जैसे पहले देश में सोने कि कमी नहीं थी आज सोने का रेट आसमान छु रहा है आम आदमी तो सिर्फ शादी ब्याह जैसे ही अवसरों में गहने बनवा पाता है वो भी क़र्ज़ ले कर | रहा सवाल सिलेंडर का तो आज हर पेट्रोल गाड़ी सिलेंडर से चल रही है ठीक है काली टंकी लगी है तो क्या हुआ अन्दर गैस तो लाल टंकी की भरी है, रही सही कसर कैटरिंग वाले,होटल वाले पूरी कर रहे है फायदा तो गैस डीलर उठा रहा है ३२० की टंकी ४५०-५५० तक बिक रही है आम उपभोक्ता को बताया जाता है कि २१ दिन के बाद नम्बर लगेगा चलो नंबर लगा लिए तो २१ दिन के बाद इंतजार में बैठे है कि अब सिलेंडर आयेगा जब नहीं आता है तो सब्र के बांध टूट जाते है और उपभोक्ता जाता है डीलर के पास एक ही जवाब मिलना है, अभी सिलेंडर नहीं है सीधे मुंह बात भी नहीं करते
आप कल्पना कीजिये कि कोई दारू कि दुकान में जाता है और उसके पास २ रु भी कम पड़ गए तो दुकान मालिक उसके साथ कैसा व्यवहार करता है ये बताने वाली बात नहीं है चलो भाई मान लिये कि सिलेंडर नहीं है तो होटल वालो और शादी वगेरह में देने के लिये कहाँ से आ जाता है सिलेंडर, गाड़ी में कहा से गैस डालते है, हमारे राजनांदगांव में तो कोई गैस रिफलिंग पम्प नहीं है,छापे पड़ते है लेकिन हमेशा की तरह कुछ ले दे के बात आई गयी हो जाती है सरकार को कोई फिकर ही नहीं है अन्यथा इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाती,पेपर वाले,मिडिया वाले भी कोई बड़ी खबर की तलाश में रहते है इन सब चीज़ों से क्या लेना देना उनको, अगर कोई इमानदार पत्रकार इस टाइप की खबर ले के गया भी तो संपादक महोदय उसे चलता कर देंगे जिस आदमी को जरुरत है सिलेंडर की जिसके घर में खाना बनाना है उसे भी मज़बूरी में बाहर से ५०० में खरीदना पड़ता है बस फस गया बेचारा चक्कर में वो ऐसे कि अपनी टंकी दे के वो दूसरी टंकी ले आया और उसी के साथ उसका टंकी नम्बर भी बदल गया जब वो दूसरी बार एजेन्सी में जाता है तो नम्बर के चक्रव्यूह में उसकी चप्पले घिस जाती हैं और वो सोचता है कि इससे अच्छा था कि चूल्हे में ही खाना बना लेता लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि जो लोग कालाबाजारी कर रहे है उनको नम्बर की आवश्यकता नहीं होती ? ये देख के कभी कभी ये कुत्सित ख्याल मन में आता है अंग्रेजो का शासन काल ही अच्छा था जो इस तरह का काम करने वालो को सरेआम हंटर से मारते थे ........

1 टिप्पणी:

  1. sahi likha hai apane...aaj desh ke ek badi jansankhya ka yahee dard hai.......
    aage kya hoga ye to mai nahi janata bt abhi zindagi kee mushkilen or badhengi iska andaja to hai....

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