10 अक्तूबर 2009

निदा फाज़ली

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूँढ्ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नही जाता
वो एक ही चेहरा तो नही सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यो नही जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नही जाता
वो ख्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है
वो ख्वाब हवाओं में बिखर क्यों नही जाता

2 टिप्‍पणियां:

  1. निदा फज़ली की बेहतरीन गज़ल पढ़वाने के लिए,
    आभार!

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  2. निदा फ़ाजली साहब की इस गजल के लिये तहे दिल से शुक्रिया
    जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता

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