06 नवंबर 2010

यात्रा विवरण

अभी अक्टूबर में करेला ढारा मंदिर गया था वहां से लगभग 1 किमी दूर कोपेडिह नवागांव भी गया यहां पर मां भवानी का मंदिर है मां भवानी का मंदिर डोंगरगढ़ से खैरागढ़ रोड पर व्हाया भण्डारपुर से 18 किमी की दूरी पर पुराना करेला की भवानी डोंगरी पर स्थित है किवदंतियों के अनुसार लगभग 250 वर्ष पूर्व एक कन्या जिसके शरीर में चेचक(बड़ी माता) निकली हुई थी,पुराना करेला निवासी गौटिया गैंदसिंह कँवर के पितामह श्री उमेंद सिंह के घर पहुंची । गर्मी से व्याकुल,पूरे शरीर में विद्यमान जल भरी हुई,चेहरे में तेज,उन्न्त ललाट,श्वेत वस्त्र धारण किये उक्त कन्या के आश्रय की व्यवस्था में गौटिया जुट गये,किंतु थोड़े देर में ही वह कन्या आंखों से ओझल हो समीपस्थ जंगल की ओर जाने लगी गौटिया के साथ गांव के अन्य लोग भी अकेली कन्या को चैत्र मास की दोपहरी में जाते देख पीछे-पीछे जाने लगे,धीरे-धीरे वह कन्या पहाड़ी की सबसे उंची चोटि पर घने जंगलों को चीरते हुई पहुंच गयी,पीछे-पीछे ग्रामवासी गिरते हांफते पहुंचे, एक झाड़ के नीचे कन्या ने रुकने की इच्छा जताई ग्राम वासियों ने छाया करने के इरादे से आजू-बाजू पेड़ों की डालों को काटकर लौटने के पश्चात देखा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा वह कन्या गायब हो गयी थी, सब लोग वापस लौट गये ,उसी रात गांव के गौटिया उमेन्द सिंह को सपने में उस कन्या ने दर्शन दिया और कहा मैं कहीं नहीं गयी हूं मैं इसी पहाड़ी पर हूं मेरा छोटा सा स्थान बनवा देना, कहते हैं उस पहाड़ी पर आज भी सिंह का वास है,स्थानीय लोगों का कहना है कि गाय बैल गुम हो जाने पर मां भवानी के नाम का नारियल रख देने से मवेशी वापस आ जाते हैं,यहां पर एक ऐसा वृक्ष है जिसके नीचे बैठने से ब्लडप्रेशर अपने आप संतुलित हो जाता है ।
नीचे कुछ झलकियां हैं आशा है आपको जरूर पसंद आयेंगी












1 टिप्पणी:

  1. डोंगरगढ़-खैरागढ़ की तो हमारी भी हसीन यादें हैं... :)

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