19 अगस्त 2011

हाले दिल

काँटों भरी है मेरी जिन्दगी,कैसे इसके छाले तुम्हे दिखाऊँ
दुख से भरी कहानी मेरी, कैसे इसको तुम्हें सुनाऊँ
मधुशाला में पीते-पीते,पूरी उम्र गुजर जाती है
हर गम का कितना पैमाना, कैसे तुम्हें बताऊँ
हरदम हरपल तेरी बातें, हर कोई बेगाना लगता है
हर दिल से जैसे मेरा, हर रिश्ता पुराना लगता है
सबके होठों पर तेरी बातें, हर कोई दीवाना लगता है
हर रिश्ते से तेरा रिश्ता, जैसे अपना-सा लगता है
हर कोई ढूँढे मयखानों को, हर कोई दो पैमाने पीता है
मैं जो पी लूं तेरे पैमानों से, नशा सौ पैमानों सा लगता है
दो चार पैमानों को पीकर के, हर कोई बहकता रहता है
अपना तो हर आलम जैसे, फूलों जैसा हँसता है ……

31 मई 2011

अंडा भूर्जी

घर में रहता हूँ तो कुछ पकाने का,कुछ बनाते रहता हूँ तो चलिये आज अंडा भूर्जी बनाते हैं सबसे पहले तैयारी करते हैं सामग्री -2 अंडे,नमक स्वादानुसार, पिसी लाल मिर्च 1/2 छोटा चम्मच, काली मिर्च एक चुटकी,मिडियम साइज का एक प्याज लंबे टुकड़ों में कटा हुआ , दो हरी मिर्चें बारीक कटी हुई,एक टमाटर बारीक कटा हुआ ,

29 मई 2011

नवेगाँव डेम

आज नवेगाँव डेम जाने का मौका मिला तो आपको भी जाने का रास्ता बता देता हुँ,रायपुर से नागपुर जाते समय राजनांदगाँव पड़ता है रायपुर से

12 मई 2011

बाल श्रम का अधिनियम इनके उपर क्यों नहीं लगता

आज कल टीवी में कई सीरियल ऐसे चल रहे हैं जिसमें छोटे छोटे बच्चे काम कर रहें हैं ऐसे बच्चों को काम करते देख कर इतना गुस्सा आता है कि क्या बताएं आपको, जी में आता है ऐसे डायरेक्टरों को गर्म तवे में बिठा कर ..........

09 मई 2011

रियाज खैराबादी

मय रहे, मीना रहे, ग़र्दिश में पैमाना रहे
मेरे साक़ी तू रहे, आबाद मयखाना रहे।

13 नवंबर 2010

अनोखी दुनिया

आईए आज आपको ऐसी दुनिया में ले चलते हैं जिनका अपना अलग संसार है जो रात दिन सफर करते हैं समय पे हम तक दुनिया भर का सामान पहुंचाते हैं लेकिन जिनके खुद के घर अनाज है कि नही ये उनको पता नहीं रहता, ये हैं ट्रक वाले कभी-कभी ट्रक के पीछे ऐसी बातें लिखी रहती हैं जो दिल को छु लेती हैं
आज ऐसी ही ट्रक के पीछे एक बात लिखी हुई थी

06 नवंबर 2010

यात्रा विवरण

अभी अक्टूबर में करेला ढारा मंदिर गया था वहां से लगभग 1 किमी दूर कोपेडिह नवागांव भी गया यहां पर मां भवानी का मंदिर है मां भवानी का मंदिर डोंगरगढ़ से खैरागढ़ रोड पर व्हाया भण्डारपुर से 18 किमी की दूरी पर पुराना करेला की भवानी डोंगरी पर स्थित है किवदंतियों के अनुसार लगभग 250 वर्ष पूर्व

12 अक्टूबर 2009

ऐसा क्यों हुआ कि
मैं उब गया हर किसी से
इनसे भी उनसे भी,अपनों से,गैरों से
यहाँ तक कि आपने आप से

10 अक्टूबर 2009

आजादी

आज़ाद हुए देश को इतने साल हो गए
और हम आज भी आजाद नहीं हैं
बंधे हुए हैं रुढीवादियों की जंजीरों से
इस कदर बढ़ते हुए भ्रस्टाचारों से
बढती हुई गरीबी से लाचार हैं हम
बढती हुई महंगाई से मजबूर हैं हम
कर रहें हैं फाकें इस देश में लोग
हमको ही नोच रहें है इस देश में लोग
क्या है कि कुछ लोग बरबाद नही हैं
और हम आज भी आजाद नहीं हैं

निदा फाज़ली

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूँढ्ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नही जाता
वो एक ही चेहरा तो नही सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यो नही जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नही जाता
वो ख्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है
वो ख्वाब हवाओं में बिखर क्यों नही जाता

08 अक्टूबर 2009

कमला

अब नही सहा जाता ,कमला के बापू ने पेट पकड़े हुए कहा, कई दिनों से ही बापू बीमार था पाँच साल की कमला अपनी नन्ही नन्ही आंखों से सब देख रही थी मगर उसके बस में कुछ नही था .नुक्कड़ का डॉक्टर भी देख गया था अस्पताल जाने के पैसे भी नही थे सब कुछ शराब की भेंट चढ़ चुका था,कमला की माँ ने मंगलसूत्र बेच कर दो दिनों की दवा ला दी थी,आज कुछ बेचने को भी नही था.कर्जदार सोच रहे थे कही चल बसा तो पैसे भी डूब जायेंगे अभी तगादा कर लो वो भी वही डेरा डालकर बैठे हुए थे कमला ने नम आँखों से अपने फटे बस्तेकी और देखा और माँ से कहा, मेरा बस्ता बेच दो पिता की पथरायी आँखे कमला की ओर देख रही थी और बाहर अर्थी की तय्यारी हो रही थी.

निदा फाज़ली

कहीं-कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है
तुम को भूल न पाएंगे हम,ऐसा लगता है
ऐसा भी एक रंग है जो करता है बातें भी
जो भी इसको पहन ले वो अपना सा लगता है
तुम क्या बिछडे भूल गए रिश्तों की शराफत हम
जो भी मिलता है कुछ दिन ही अच्छा लगता है
अब भी यूँ मिलते है हमसे फूल चमेली के
जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है
और तो सब कुछ ठीक है लेकिन कभी-कभी यूँ ही
चलता फिरता शहर अचानक तनहा लगता है

निदा फाज़ली

बदला न अपने आपको जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे दूर ही रहे
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोडी बहुत तो जेहन में नाराज़गी रहे
गुजरो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमे खिले है फूल वो डाली हरी रहे
हर वक्त हर मकाम पे हँसना मुहाल है
रोने के वास्ते भी कोई बेकली रहे

यक्ष प्रश्न

दोस्तों राम राम और जो नियमित ब्लॉग लिखते है उनको कर बद्ध सलाम वो इसलिए कि पता नही इतना टाइम उनके पास कहाँ से आता है और चलो टाइम को जाने भी दो क्योकि "सब तो निकम्मे ही हैं "इतना दिमाग कहाँ से आता है यार कि रोज लिख लेते है कौन सा घी खाते है या कौन से घुट्टी पीते है हमें समझ नही आया आज तक
खैर छोड़ो वैसे भी हमें आज बहुत दिनों के बाद टाइम मिला है ब्लॉग लिखने का, इसलिए आप लोगो का टाइम खोटी नही करूँगा
आज का यक्ष प्रश्न है कि-
लोग पैसे के पीछे क्यो भाग रहे है ?



29 अगस्त 2009

निदा फाज़ली

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तनहा होगा
इतना सच बोल कि होटों का तबस्सुम न बुझे
रोशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा
प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली
जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा
एक महफ़िल में कई महफिलें होती हैं शरीक
जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा
मेरे बारे में कोई राय तो होगी उसकी
उसने मुझको भी कभी तोड़ के देखा होगा

यक्ष प्रश्न

आज का प्रश्न है : गया वक्त गुजर कर क्यों नही आता

28 अगस्त 2009

यक्ष प्रश्न

आदरणीय लोगों को आज ये बताते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि चंडूखाने में आज से ऐसे चंडू सवालों की शुरुआत हो रही है कि इसका जवाब तो शायद दुनिया बनाने वाले के पास भी न हो लेकिन हमारे ब्लोगर बंधू इन सवालो का जवाब आसानी से दे सके ?
आज का प्रश्न-------
भगवान् ने पेट को बीच में क्यों लगाया ?उपर नीचे भी कर सकता था

26 अगस्त 2009

मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन अपन बेटे को राजनीती की शिक्षा दे रहा था उसने अपने बेटे से कहा चढ़ जा सीढ़ी पर बेटा चढ़ गया ,जब वो पूरी सीढ़ी चढ़ गया तो मुल्ला बोला अब बेटा कूद जा मैं तुझे संभाल लूँगा बेटा थोड़ा डरा सीढ़ी ऊँची कही बाप चुक गया तो हाथ से छुट गया तो कहीं

25 अगस्त 2009

मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन १०० साल के हो गए तो उनके मित्र ने पूछा यार मुल्ला तुन्हारे १०० साल तक जीने का क्या राज है
मुल्ला ने कहा २-३ दिनों तक ठहरें
मित्र ने फिर पूछा २-३ दिन में कैसे बता दोगे क्या खोज बीन में लगे हो
मुल्ला ने कहा नहीं दो तीन कम्पनियों से बात चल रही है जो कम्पनी ज्यादा देगी वही राज है एक बिस्कुट कम्पनी है ,एक बोर्नविटा वाले है और एक विटामिन बनाने वाली कम्पनी है

निदा फाज़ली

माननीय,आदरणीय,सम्माननीय,पहलवानी श्री समीर भइया को ये निदा फाज़ली साहब की गजल समर्पित करता हूँ उनकी 20 अगस्त की पोस्ट टैक्सस की यात्रा पे

हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए
घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने हँसाने के लिए

यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम
ये नगीने तो हैं रातों को सजाने के लिए

अब जहाँ भी है वहीँ तक लिखो रुदाद-ए-सफ़र
हम तो निकले थे कही और ही जाने के लिए

मेज़ पर ताश के पत्तों सी सजी है दुनिया
कोई खोने के लिए है कोई पाने लिए

तुमसे छुट कर भी तुम्हे भुलाना आसान न था
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए

* निदा फाज़ली *
रुदाद-ए-सफ़र :यात्रा वृत्तान्त